पंडुकी -एक लघु कथा

मेरे घर के ओसारे में, एक छोटा सा पंखा टंगा है, जो बहुत दिनों से लगभग बंद पड़ा है. नीचे एक कुर्सी पर बैठा मैं कुछ लिखता-पढ़ता रहता हूँ. पंखे की ऊँचाई कुछ ज्यादा नहीं है, मै आसानी से उसे छू सकता हूँ. उस पंखे के उपर पंडुक का एक जोड़ा आ कर अपना कब्जा जमा लिया है. दोनों ने मिल कर, कुछ घास-फूस ला, अपना घोसला तैयार कर लिया है. बहुत करीने से, सुन्दर से. जब इन्हें अंडे देना होता है, तभी ये घोसला बनाते है और उसमें रहते हैं. अन्यथा ये किसी पेड़ के डाल पर रह कर ही गुजारा करते हैं.शायद वे हर तरह से आजाद रहना चाहते हों. रात के दस बजे हैं. घोसले मे पंडुकी बड़े मजे से बैठ कर शायद सो रही हो. वह हम से तनिक भी भयभीत नहीं रहती. मानो उसे हम पर पूरा बिश्वास हो. हो सकता है अपने बच्चों के खातिर वह यह खतरा मोल ले रही हो. पंडुक दिन में तो यहॉं आता है, पर रात में पंडुकी को यहॉं अकेला छोड़ स्वयं रात्रि विश्राम के लिये अन्यत्र चला जाता है. सुबह पंडुक यहॉं जल्दी आ जाता है और खाना ला कर पंडुकी को दे जाता है. पंडुकी अपने अंडे-बच्चे को छोड़ कर पल भर के लिये भी कहीं नहीं जाती. और अपने को पूरी जोखिम में डाल कर भी बैठी रहती है. यही तो है एक मॉं का अपने बच्चों से सच्चा प्यार.वह कोई भी खतरा अपने बच्चों के लिये झेल सकती है. बच्चे जब कुछ बड़े होते हैं, तो पंडुकी अपने मुँह में दाना ले कर बच्चों के मुंह में डाल उन्हें खिलाती है और वैसे ही पानी भी पिलाती है.यह सब तब तक चलता है, जब तक बच्चे बड़े होकर स्वयं उड़ने नहीं लग जाते.

मैं सोचने लगता हूँ, यही तो है मॉं की ममता, जो स्वयं अपनी जान को जेखिम में डाल कर भी अपनी संतान का पालन करती है. जीव चाहे जो हो, माँ तो ऐसी ही होती है. माँ लाख कष्ट सहती है, तब जाकर बच्चे बड़े होते हैं. और जब बड़े होते हैं, तब उड़ने लग जाते है. उनकी अपनी जिन्दगी हो जाती है, अपना घोसला हो जाता है. अपनी जिन्दगी वे अपने ही ढ़ंग से जीना चाहते हैं, शायद मॉं-बाप को भूल, पिछली सभी बातों को भूल. यही तो जिन्दगी है. जो यूँ ही चलती रही है, चलती रहेगी, चलती रहेगी……

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ऐ, आषाढ़ के पहले बादल

 ऐ, आषाढ़ के पहले बादल, तूने कैसा धूम मचाया.
 रिमझिम -रिमझिम बादल बरसे, मन में प्रेम का अगन लगाया..
 बे हाल थी धरती तप्त तवा सी, तूने शीतल उसे बनाया.
 सूख रहे थे वन-उपवन सब, नव जीवन उनमें भर लाया..
 मॉं धरती थी ब्याकुल, प्यासी, तूने उनका प्यास बुझाया.
 तृप्त हुई जल तेरा पी कर, दिल उनका हर्षाया..
 हुये अंकुरित बीज गिरे जो, बन पौधा हरियाया.
 सूखे डंठल से दिखते पौधे, किसलय से भर आया..
 लगी संवरने धरती फिर से, ओढ़ हरी चादर अपने तन.
 बेहाल जो थे, खुशहाल हुये, आह्लाद से भरे उनके मन..
 ताप पवन के मंद पड़े, कम हो गयी उनकी तीव्र जलन.
 अब बन सुहावना और सुखद, बन शीतल, जीता सब के मन..
 छटा देखिये कैसे नभ में,  छाया बादल घोर-घना.
 गर्जन-तर्जन, कड़क-धड़क से, बाहर जाना कर रहा मना..
 ऐ आषाढ़, तुझे धन्यवाद, शुक्रिया है, जल बरसाने का.
 सूखी-प्यासी पड़ी धरा पर, नव यौवन छलकाने का..
 ऐ आषाढ़, तुम्हे धन्यवाद, गरमी से त्राण दिलाया.
 प्यासी धरती और जीव-जन्तु का, तुमने प्यास बुझाया..
 मैं जान चुका तेरी कीमत, वैशाख-जेठ दुपहरिया में.
 पहचान चुका महिमा तेरी, कुछ बीते चन्द महीनों में..
 तू जीवन का दायक, राजक, यह जीवन तुझ से चलता है.
 हो जाता जीवन अस्त-व्यस्त, त्राहिमाम मच जाता है..
 वारिद तेरा जल नही दिया तो, कृषक हाथ मलता है.
 सूखा-अकाल पड़ने का डर, साफ-साफ दिखता है..
 बडा़ भरोसा रहता तुम पर, जल, जीवन देने वाले.
 तुझ पर ही उम्मीद है रहती, भर दोगे गड्ढे-नाले..
 तुझसे ही प्यासी माटी ने, गीली होना सीखा है.
 सूख-सूख मरते पौधे ने, फिर से जीना सीखा है..
 रिमझिम गिरती बूंदों से, मन का हर अवसाद मिटाया.
 ऐ, आषाढ़ के पहले बादल, तूने कैसा धूम मचाया.