क्यों उदास रहते हो

बता, ए नादां दिल, क्यों उदास रहते हो।
तुम तो चंचल हो, फिर क्यों हताश रहते हो॥
तुम तो स्थिर नहीं रहते, यही ख्याति है तेरी।
क्यों अपनी ख्याति का, उपहास किये देते हो॥
करो जो ठीक लगे, सोच लो बस, धीरज से।
करो कबूल तुम वही, तुम्हें जो भाता हो॥
तुम तो पावन हो, निर्मल हो, निष्कलंक बड़े।
पर किसी मोह से, मोहित तो कभी होते हो॥
त्याग दो काम-क्रोध, छोड़ दे तू लोभ-मद को।
है पथ दुरूह, पर, मुमकिन तू ही कर सकते हो॥
यही हैं दोष, डुबोती, जो हैं मानव को सदा।
फिर भी सब जान, क्यों अनजान बने दिखते हो॥
हो एक खजाना तू, भरे हो बल-विवेक से तुम।
क्यों न इस शक्ति को, सत्कर्म में लगाते हो॥ बता, ए नादां दिल….