चलो रे मन, कलह जहाँ ना होय

चलो रे मन, कलह जहाँ ना होय.

इस दुनियॉं में सभी दुखी हैं, नहीं चैन से कोय.
लोभ-क्रोध में सभी मगन हैं, दुखी यहाँ हर कोय.. चलो रे मन, कलह जहाँ ना होय.

हिंसा को रहते हैं आतुर, दया-धर्म से दूर.
छीना-झपटी में मशगूल, व्याकुल, बन बैठे हैं क्रूर.. चलो रे मन, कलह जहाँ ना होय.

दिल में सब के प्रेम भरा हो, घृणा जहॉं ना होय.
पर पीड़ा से दुखी हो मनवा, प्रेम-प्रेम ही होय.. चलो रे मन, कलह जहाँ ना होय.

बड़े-बड़े ज्ञानी-मुनी आए, दिये प्रेम संदेश.
बुद्ध, महावीर जैन और गांधी, का यह अद्भुत देश.. चलो रे मन, कलह जहाँ ना होय.

महाविभूतियों के जीवन से, मिले यही संदेश.
प्रेम-शांति के पथ पर चल मन, मिट जाएँगे क्लेश.. चलो रे मन, कलह जहाँ ना होय.

जन-जन मन में प्रेम जगा हो, घृणा रहे नहीं शेष.
हर मन में उल्लास भरा हो, ऐसा हो मेरा देश.. चलो रे मन, कलह जहाँ ना होय.