विघ्न से लड़ता चला गया

मै जिन्दगी भर, विघ्न से, लड़ता चला गया .
अपना बुलंद हौसला, करता चला गया ..
बाधायें कई आईं, दीवार बन के सामने.
रोकने को रास्ता, अड़ा खड़ा था सामने ..
विकराल रूप ले खड़ा, मिला था मग में सामने .
अंत मेरी जिन्दगी का, बन खड़ा था सामने ..
ललकारता, फटकारता, चिघ्घारता था सामने.
निर्भीक आगे मै सदा, बढ़ता रहा ही सामने ..
मेरे हौसले के सामने, पस्त वो होता गया .
मै जिन्दगी के ऱाह पर, मस्त हो बढ़ता गया..
मेरा राह था सन्मार्ग का, न्याय से उत्थान का .
विकास का अधिकार तो, होता है हर इन्सान का..
बाधायें थी तो राह में, जाना मगर जरूर था .
जूझकर, हर विघ्न से, पार पाना मगर जरूर था ..
घबरा कभी, रूका नहीं, बढ़ता ही चला गया.
जिन्दगी के राह पर, चलता ही चला गया ..
छूना है जब ऊँचाई को, तो हौसला रखो .
रूको न कोई विघ्न से, आगे सदा बढ़ो ..
बढ़ते चलोगे, रास्ता मिलता चला ही जायेगा.
अंजान कोई शक्ति तुझको, पथ दिखाता जायेगा ..
वक्त कितना भी हो मुश्किल, हौसले से काम लो .

‘चाह जहां, राह वहां’, कथन सही है, मान लो ..