मैं तो मुसाफिर हूँ

मै तो मुसाफिर हूँ, अकेला, कोई ठौर नहीं.
पथिक मैं उन राहों का, जिनका कोई छोड़ नहीं..
बढ़ता ही जाता हूँ, निरन्तर, अपनी राहों पर.
ले कर विश्रान्ति, कहीं पेड़ों के छाहों तर..
ले लूँ कुछ झपकियॉं भी, पल, या दो पल को.
विराम दे देता हूँ, अपने तन-बल को..
लेटूँ कहीं छाह में, मुलायम, हरे घास पर.
मिटाऊँ थकन मन का, पहुँचने की आस पर..
ले लेती नींद मुझे, अपनी आगोश में.
मैं तो एक राही, दीवाना, कहाँ होश में..
दीवाना तो दीवाना है, उसका कहाँ ठिकाना.
पता-ठिकाना जिसका हो, वो कैसा दिवाना..
मत रोक मुझे, आ मत, मेरी राहों में रोड़े बन कर.
पथिक को जाने दो, राह दो, मार्ग-प्रदर्शक बन कर..
मत रोक मुझे, चलने दो, वर्ना पथिक कहाँ रह पाऊँगा.
रूक जो गया, तो पथिक नहीं, जड़, पत्थर-सा, रह जाऊँगा..

भोले बाबा

महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर आप सबों को हार्दिक शुभकामनाओं के साथ यह गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ। आशा है, आप सब को अच्छी लगेगी।

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भोले बाबा, भोले बाबा, सच ही हो तुम भोले.
खाते तुम कुछ और नहीं, लेते बस भंग के गोले..
रहते कैलाश पर, हिमालय पहाड पर.
संग माता पार्वती, बसहा सवार कर..
जहॉं कहीं जाते भोला, संग माता पार्वती.
अर्धॉंगिनी तेरी, मॉं मेरी, सदा तेरे संग होती..
चंदा सोहे सिर पर तेरा, जटे गंगाधार हो.
लपेटे भभूत तन में, नागों का हार हो..
भोले, बिना पार्वती, तुम भी अधूरा हो.
शिव-शक्ति दोनों मिले, तभी होते पूरा हो..
एक कर में डमरू सोहे, एक तिरशूल से.
नटवर का नट लीला, देखो मशगूल से..
भोले बाबा, तू तो सदा, वन में ही वास करते.
रहते जैसे जनजाति, वैसे निवास करते..
कितनी है शक्ति तुझमें, कोई नहीं जानता.
सर्व शक्तिमान तुम हो, सब है ये मानता..
थाह कहाँ पाता कोई, तुम तो अथाह हो.
उसे भी उबार लेते, लगे जो तबाह हो..
मंथन से, सागर के, अमृत-हलाहल मिले.
सब चाहें अमृत, हलाहल फिर कौन पिये..
भोले बाबा, तू ही बस, हलाहल का पान किया.
कंठ में सजा के इसे, दुनिया को त्राण दिया..
भोले बाबा दानी औघर, मांगो वही दान देते.
भले कभी ऐसा कर, खुद ही परेशान होते.. भोले०