बचपन मेरे

बचपन मेरे, इतना बता, क्यों याद यूं आते हो तुम.
दिल के भरते जख्म को, कुरेद क्यों जाते हो तुम..

बचपन की बातें और थी, तब पज्ञी था, उड़ता गगन में.
उन्मुक्त था, जाऊँ जिधर, दिल सदा रहता मगन मे..

जवाबदेही कुछ न थी, सम्राट था मै दिल का अपना.
बालकसुलभ सब काम करना, नित्य दिन का काम अपना..

छल नही था, मल नही, प्रपंच से दिल दूर था.
सच्चाई एवं सादगी के, गुण से मन भरपूर था..

जिद बड़ी थी, ललक भी था, चाहिये तो चाहिये था.
सम्भव था मिलना ,या असम्भव, पर मुझे बस चाहिये था..

सम्भव नही होता सदा, सब पू्र्ण चाहत कर सके जो.
मॉ-बाप चाहे कोई हो, सम्राट ही चाहे रहे जो..

ऊँचे गगन का चॉद प्यारा, ही खिलौना चाहिये.
चमचमाता चॉद, उसको खेलने को चाहिये..

देश परियों का जहॉं है, मै वहॉ पर जाऊँगा.
साथ में कुछ उनके बच्चों, को यहॉ पर लाऊँगा..

हाथी का बच्चा पकड कर, उस कूएं मे डालिये.
बॉध कर रस्से से उनको, खींच बाहर लाइए..

मुड़ कर जो पीछे देखता हूँ, याद आती बात जब.
स्तब्ध हो जाता हूँ मै, सोंच सारी बात अब..

सोंचता ये सारी बातें, स्वप्न सी ही रह गयी.
जाने कब ये त्याग मुझको, कब किधर को चल गयी..

बचपन मेरे, इतना बता, क्यों याद यूं आते हो तुम.
दिल के भरते जख्म को, कुरेद क्यों जाते हो तुम..