मुक्तक

1॰ फूलों से मत पूछो, बसंत कब आता है।
भंवरों से मत पूछो, बसंत क्या लाता है॥
न फूलों को है ज्ञात, न भौरों को पता।
उमंगों का तुफान जब आये, बसंत तब आता है॥

२. एक ही मॉं-बाप की, संतानें कई होती है.
हर एक की पर मति, जुदा-जुदा होती है॥
एक ही डाल पर, फूल अनेकों खिलते है।
पर कौन जाने, किसकी क्या गति होती है॥

३॰ दहशतगर्दों, क्यों सदा दहशत कराते हो।
निर्दोषों का कत्ल, क्यों सरेआम कराते हो॥
किसी को जीवन नया, दिला सकते नहीं।
फिर क्यों किसी का, जीवन हरण कराते हो॥

४. ढाई अक्षर के ‘प्रेम’ ने, इतना दबदबा बनाया है।
सर्व शक्तिमान भी, इसके सामने सर झुकाया है॥
कोई बाहुबली इस दुनियॉं मे, ऐसा हुआ नहीं।
जिसने खुद को, इसके सामने नहीं नवाया है॥