पत्रकारिता

बड़ा ही पावन, दूरद्रष्टा, विद्वजन का काम है।

संयमित, निष्पक्षता, पत्रकारिता तेरा नाम है॥

समाज का दर्पण सही तू, रास्ता सन्मार्ग का।

दर्शन, दिशा-निर्दिष्ट करना, धर्म तेरे कर्म का॥

समाज का प्रतिबिंब, जन-जन को दिखाना काम तेरा।

मार्ग, जिस पर चल बढ़ें, उसको बताना काम तेरा॥

स्वतंत्रता की जब लड़ाई, लड़ रहा था देश मेरा।

पत्रकारों ने कलम से, था निभाया साथ मेरा॥

पाबन्दियाँ तुम पर लगी थीं, पर न तू विचलित हुये।

बाधाएँ अगिणत झेल, पावन कर्म सब पूरे किये॥

लेखनी तेरी चली, तब देश यूं झंझा उठी।

देश में, जन-जन के मन में, देशभक्ति जाग उठी॥

देश की आजादी में, तेरा बड़ा ही हाथ है।

देश को विकसित बनाने, में दिया तू साथ है॥

देश तेरी महती सेवा, को कभी भूला नहीं।

अफसोस है, पर आज तेरा, पावन रूप वह दिखता नहीं॥

नैतिकता का अब पतन, दिखता है तेरे काम में।

दाग लगने लग गयी अब, तेरे पावन नाम में॥

क्या कमी है आ गयी, धूमिल हुआ यह नाम क्यों।

दामन तो तेरा साफ था, फिर लग गया यह दाग क्यों॥

क्यों तेरी निष्पक्षता पर, प्रश्न है लगने लगा अब।

संयम व तेरी दूरदृष्टि, पर है शक होने लगा अब॥

क्या अब नहीं दर्पण रहा तू, सच की जो सूरत दिखाये।

जैसी  सूरत जिसकी हो, प्रतिबिंब पूरा जो दिखाये॥

क्या समय के साथ ढेरों, पड़ गये अब गर्द उन पर।

या मोह, लालच, बेईमानी, की पड़ी अब पर्त उन पर॥

क्या बेच डाले अस्मिता, तुच्छ धन के अंध लोभ में।

गिरवी दिया रख खुद को शायद, या तेरे कुछ लोग ने॥

गयी कहाँ निर्भीकता, तेरी कलम का ओज़ वह।

सच्चाई व ईमान पर, मर मिट जाने का मौज वह॥

ओज़ अब तेरी कलम में, क्या बचा कुछ है नहीं।

ज़मीर पूरी मर चुकी, या बच रही थोड़ी कहीं॥

दुनिया तुझे थी देखती, एक सत्यवादी रूप में।

पर रहे अब तू न वो, दिखने लगे विद्रूप में॥

समय है पर शेष अब भी, ईमान अपना फिर जगा।

देश-दुनिया के लिए, वह खोयी ताक़त फिर लगा॥

तोड़ मत मेरा भरोसा, कर भला फिर देश का।

पावन बड़ा हो कर्म तेरा, गौरव बनो फिर देश का॥

 

गुल

गुल नहीं करता कभी भी, नाज़ अपने आप पर।

कोमल कली या अधखिली, नव किसलयों के रास पर॥

कोमल-मुलायम डालियाँ, पत्ते बड़े रंगीन हैं।

हर पौध के पत्ते लिए, कुछ रूप भिन्न-भिन्न हैं॥

पत्ते अनेकों रंग ले, हैं लाल, पीले व हरे।

या अनेकों रंग के, कुमकुम लगे उन पर ज़ड़े॥

पुष्प हैं कितने खिले, अनगिनत रंगों से भरे।

खुशबू सबों के भिन्न हों, पर हैं सभी मधुरस भरे॥

हे रातरानी, नाम तेरा, जो दिया, क्या खूब है।

अनुरूप तेरे नाम के, तेरे गुण भी क्या बाखूब हैं॥

सुगंध तेरा है अनोखा, मस्त कुछ ऐसा करे।

खिंचते चले आते सभी, कोई दूर कैसे-क्यों रहे॥

मदहोश होते मधुप पी, मादक, मधुर मकरंद को।

पंखुरी के रंग लुभावन, भाते हैं अंतरंग को॥

बालाओं के अलकाओं में, तू शोभती बंध कर जुड़े से।

देवों के सर पर चढ़े जब, शोभती मिल तू जटा से॥

सम्मान पहना हम है देते, पुष्प की माला गले में।

‘सेज़ फूलों का’ बना, उपमा जो देते हैं मज़े में॥

गुल हैं रहते साथ ही, जीवन में, या फिर बाद भी।

सुख में गले का हार बन, या चढ़ जनाज़ा बाद भी॥

जिंदगी भर जो निभाए साथ, ऐसे कम मिलेंगे।

गुल जो तेरा साथ है, अहसान है, कैसे चुकेंगे॥

तुम खिला करते न केवल, माली के उद्यान में।

खिलते हो तुम, बहुतायतों में, निर्जन सघन बियावान में॥

तुम, प्रकृति की कृपा हो, या करिश्मा कर्म का।

जो भी हो, पर हो तू बेशक, विषय महती गर्व का॥

ऐ गुल, है हृदय विशाल तेरा, चाहे रहो जिस हाल में।

कोमल ही तुम रहते सदा, हँसते सदा हर हाल में॥

मैं क्या बोलूँ

बनाने वाले, ज़रा बता दे, मैं क्या बोलूँ।

छिपा क्या राज इस दिल में, भला मैं क्या खोलूँ॥

रिश्ता एक नहीं, हैं अनगिनत रिश्ते तेरे।

तुम्ही से जन्म लिया, मा-बाप भी तुम्हें बोलूँ॥

तुम्ही हो बंधु मेरे, तुम ही सखा मेरे।

तुम्ही अनुज मेरे, बता मैं क्या बोलूँ॥

तुम्ही हो शक्ति मेरी, मैं असक-विवश सा हूँ।

तेरे बगैर हूँ लाचार, बता मैं क्या बोलूँ॥

तुम्ही तो सूर्य मेरे, चाँद भी तुम्ही मेरे।

ये चमक-दमक भी तेरी, बता मैं क्या बोलूँ॥

तेरा एहसान मुझ पर, तूने जो बनाया मुझे।

सिला एहसान का क्या दूँ, बता मैं क्या बोलूँ॥

छुपा भी क्या है भला, कुछ भी तो नहीं तुमसे।

कोई पर्दा है अगर, बता किस तरह फेकूँ॥

करो वही जो सही, दिल को भाता तेरे।

दे दो बस शक्ति मुझे, राह तेरे चलता ही चलूँ॥

कोई शिकवा न मेरी, कोई शिकायत भी नहीं।

करो जो मर्ज़ी तेरी, क्यों मैं प्रतिरोध करूँ॥

तुम करो जो भी, भला ही हो करते।

तेरी हर बात है भली, बता मैं क्या बोलूँ॥