देशरत्न डॉ राजेंद्र प्रसाद

ऐ भारत के वीर पुत्र, मैं नमन तुझे करता हूँ,

श्रद्धा के फूल चरण पे तेरा, मैं अर्पित करता हूँ I

तीन दिसम्बर कितना शुभ था, जब तेरा था जनम हुआ,

जीरादेई नाम ग्राम का, तुझको पाकर धन्य हुआ  I

धन्य हुई सारण की धरती, धन्य हुआ तब राज्य बिहार,

भारत माता धन्य हुई , बालक को पाकर हुई निहाल  I

पले-बढे जीरादेई में, शिक्षा का प्रारम्भ किया,

उच्च विद्यालय पटना से पढ़, रौशन उसका नाम किया I

कलकत्ता से कॉलेजी शिक्षा, पाये वहाँ पर जाकर,

धन्य हुआ प्रेसिडेंसी कॉलेज, ऐसे शिष्य को पाकर I

विधि के स्नातक बने वहाँ से, पटना लौट शुरू किये वकालत,

पर बहुत दिनों तक नहीं कर सके, आ कर यहां वकालत I

बापू के सहयोगी बनकर,  किया देश का काम,

लड़े साथ मिल-जुल कर के वे, आजादी संग्राम I

डंडा खाए, जेल गए, सत्याग्रह की करी लड़ाई,

रहे सदा वे साथ बापू के, जब तक चली लड़ाई I

वार्ता अंग्रेजों से करने, इंग्लॅण्ड पड़ा जाना था उनको,

संग में गांधी और जवाहर, साथ अन्य भी थे उनके I

वायुयान तब होता ना था, जल जहाज से जाना था,

इंग्लॅण्ड जाकर, वहाँ कोर्ट में, कुछ कार्य विधिक निपटाना था I

छः माह तब लग जाते थे, जल जहाज को जाने में,

यही एक साधन था केवल, इंग्लॅण्ड तक जाने में I

भूल हुयी, एक पत्र जरूरी, छूट गया था भारत में,

कैसे काम चलेगा उस बिन, पड़ गए सब दुविधा में I

पर जब राजेंद्र रत्न संग हो, हो तब कैसी चिंता,

अक्षरश: लिखवाया खत को, दूर किया सब चिंता I

हुआ देश आजाद,  बने वे प्रथम सदर भारत के,

संविधान बनाने में सहयोगी, बने राष्ट्र भारत के I

इंसान बड़े सीधे-सादे थे, सादगी के थे मूरत,

नमन करेगा देश हमारा, सदा-सदा, हर सूरत I

देशरत्न राजेंद्र प्रसाद, तुम छोड़ चले गए हमको,

यह विधान दुनिया का है, कोई कैसे टाल सके इसको I

पर गए नहीं , हम देशवासी के दिल में सदा रहोगे,

जब तक देश रहेगा भारत, तुम भी अमर रहोगे I