मुक्तक-3

१. तन्हाईयाँ सब को सताती होगी,

अच्छे-अच्छों को भी रुलाती होगी I

बेज़ार रोते  होंगे, पत्थर-दिल वाले भी,

भले आवाज़ अंदर ही  सिमट जाती होगी II

२. तन्हाइयों में जब तुम्हारी याद आती है,

बयाँ  भी कर न सकूँ, कितना सताती है I

शीशे-सा दिल ये, चूर-चूर हुआ जाता है,

भूलना चाहूँ, पर ये यादें हैं, कि  दिल से न जाती है II

३.  दुख गैरों से मिले, दुनिया जानती है,

सुख अपनों से मिले, यही सब मानते हैं I

सितमगर हैं बड़े, जो अपने, नासूर बन जाते,

ज़िगर के पास रहकर, ज़िगर  को बेंधते हैं II