बयाँ जुबाँ से करूँ कैसे

ज़ख्म-ए-दिल को दिखाऊँ

तो दिखाऊँ कैसे I

तड़प रहा हूँ, तड़प

बताऊँ, तो बताऊँ कैसे II

फट रहा दिल है, सहन

करूँ तो करूँ कैसे I

बयाँ जुबाँ  से करूँ गर

तो करूँ कैसे II

बहुत हैं लोग कम

दुनिया में समझने वाले I

भला ये दर्द उन्हें

बताऊँ, तो बताऊँ कैसे II बयाँ जुबाँ  से करूँ गर, तो करूँ कैसे II

धधक रहा है, दर्द ये

शोला सा सीने में I

बुझा न पा हूँ रहा

बुझाऊँ, तो बुझाऊँ  कैसे II बयाँ जुबाँ से करूँ गर, तो करूँ कैसे II

जो मेरे साथ थे

मुँह मोड़ के गए ऐसे I

साथ नया, उनसे भला

बताऊँ, तो बताऊँ कैसे II  बयाँ जुबाँ  से करूँ गर, तो करूँ कैसे II

बहुत विवश हूँ, दुनिया में

ए  दुनिया वालों I

तोड़ना चाहूँ बेबसी

तोड़ूँ, तो तोड़ूँ  कैसे II बयाँ जुबाँ से करूँ गर, तो करूँ कैसे II

बेरहम दुनिया से , सब छोड़

चल दूँ तो अच्छा I

छोड़ना चाहता पर, सबको

छोड़ूँ, तो छोड़ूँ कैसे II बयाँ जुबाँ  से करूँ गर, तो करूँ कैसे II

छोड़ना भी न हो जाये,

कहीं बुजदिली मेरी I

इल्ज़ामें बुजदिली से, भला

बचूँ, तो बचूँ कैसे II बयाँ जुबाँ  से करूँ गर, तो करूँ कैसे II

बड़ी परेशानियाँ  आयीं जो

साथ – साथ मिलकर I

बता दे तू ही, भला

निपटूँ, तो निपटूँ कैसे II बयाँ जुबाँ  से करूँ गर, तो करूँ कैसे II

भंवर के जाल में मैं

फँस चुका, है हाल बुरा I

इस भंवर जाल से

निकलूँ, तो निकलूँ कैसे II बयाँ जुबाँ  से करूँ गर, तो करूँ कैसे II

ऋतुराज बसंत

ऋतुओं का राजा बसंत

जब धरती पर आता है I

सुगंध भरी-सी मस्ती

लाकर उन्मुक्त लुटाता है II

रंग-बिरंगे फूलों से

लद जाते  हैं पौधे सारे I

खुशबूदार पराग लिए

उड़ती तितली मनमोहक प्यारे II

भंवरे उड़ते, गुन -गुन करते

मधुपान किये फिरते हैं I

फूल लुटाते मधुमक्खी

उद्यान विहँस पड़ते हैं II

मधुमास लुटाता है मस्ती

छा जाती मस्ती है सब पर I

नहीं अछूता  बचता कोई

इनके सस्नेह निवेदन पर II

जिधर देखिये रंगे है सब

ऋतु  के रंग  बसंती में I

नहीं छोड़ता है अनंग

बिना डुबोय मस्ती में II

धरती पर आ खुद कामदेव

कुसुमों के वाण चलाते  हैं I

घायल करते मानव -मन को क्या

पशु भी बच ना  पाते हैं II

बागों में बैठी कोयल भी

कू-कू कर कुछ गाती है I

पी-पी राग पपीहे की

रुक-रुक कर आती-जाती हैं II

ढेरों पक्षी झुरमुठ में

एक-साथ मिल गाते हैं I

संगीत सुरीली मनभायी

जाने क्या राग सुनाते हैं II

भँवरे गुंजन करते फूलों पर

बंधे जैसे आलिंगन में I

ले लेती कब बाँध पंखुरी

प्यार भरे आलिंगन में II

मदहोशों को फर्क पड़े क्या

कौन बाँधता, बँधता  कौन I

फर्क न करता मदहोशी

सिर्फ निहारे, रहता मौन II

कलरव खग के, फूलों की खुशबु

बागों में मंजर आमों के I

फूलों में जो रंगें अनेक

रौनक इनसे है बागों में II

मंद पवन देता बिखेर

चहुँओर सुगंधित है इनसे I

हो जाते हैं यौवन प्रखर

इन फूलों के मकरन्दों से II

उपहार प्रकृति का है अमोल

सुन्दर फूलों का गुलदस्ता I

स्वीकार करो यह भेंट

‘प्रभु’ ने भिजवाया, जो गुलदस्ता II

  देशरत्न डॉ राजेंद्र प्रसाद

ऐ भारत के वीर पुत्र, मैं नमन तुझे करता हूँ,

श्रद्धा के फूल चरण पे तेरा, मैं अर्पित करता हूँ I

तीन दिसम्बर कितना शुभ था, जब तेरा था जनम हुआ,

जीरादेई नाम ग्राम का, तुझको पाकर धन्य हुआ  I

धन्य हुई सारण की धरती, धन्य हुआ तब राज्य बिहार,

भारत माता धन्य हुई , बालक को पाकर हुई निहाल  I

पले-बढे जीरादेई में, शिक्षा का प्रारम्भ किया,

उच्च विद्यालय पटना से पढ़, रौशन उसका नाम किया I

कलकत्ता से कॉलेजी शिक्षा, पाये वहाँ पर जाकर,

धन्य हुआ प्रेसिडेंसी कॉलेज, ऐसे शिष्य को पाकर I

विधि के स्नातक बने वहाँ से, पटना लौट शुरू किये वकालत,

पर बहुत दिनों तक नहीं कर सके, आ कर यहां वकालत I

बापू के सहयोगी बनकर,  किया देश का काम,

लड़े साथ मिल-जुल कर के वे, आजादी संग्राम I

डंडा खाए, जेल गए, सत्याग्रह की करी लड़ाई,

रहे सदा वे साथ बापू के, जब तक चली लड़ाई I

वार्ता अंग्रेजों से करने, इंग्लॅण्ड पड़ा जाना था उनको,

संग में गांधी और जवाहर, साथ अन्य भी थे उनके I

वायुयान तब होता ना था, जल जहाज से जाना था,

इंग्लॅण्ड जाकर, वहाँ कोर्ट में, कुछ कार्य विधिक निपटाना था I

छः माह तब लग जाते थे, जल जहाज को जाने में,

यही एक साधन था केवल, इंग्लॅण्ड तक जाने में I

भूल हुयी, एक पत्र जरूरी, छूट गया था भारत में,

कैसे काम चलेगा उस बिन, पड़ गए सब दुविधा में I

पर जब राजेंद्र रत्न संग हो, हो तब कैसी चिंता,

अक्षरश: लिखवाया खत को, दूर किया सब चिंता I

हुआ देश आजाद,  बने वे प्रथम सदर भारत के,

संविधान बनाने में सहयोगी, बने राष्ट्र भारत के I

इंसान बड़े सीधे-सादे थे, सादगी के थे मूरत,

नमन करेगा देश हमारा, सदा-सदा, हर सूरत I

देशरत्न राजेंद्र प्रसाद, तुम छोड़ चले गए हमको,

यह विधान दुनिया का है, कोई कैसे टाल सके इसको I

पर गए नहीं , हम देशवासी के दिल में सदा रहोगे,

जब तक देश रहेगा भारत, तुम भी अमर रहोगे I

  मुक्तक-3

१. तन्हाईयाँ सब को सताती होगी,

अच्छे-अच्छों को भी रुलाती होगी I

बेज़ार रोते  होंगे, पत्थर-दिल वाले भी,

भले आवाज़ अंदर ही  सिमट जाती होगी II

२. तन्हाइयों में जब तुम्हारी याद आती है,

बयाँ  भी कर न सकूँ, कितना सताती है I

शीशे-सा दिल ये, चूर-चूर हुआ जाता है,

भूलना चाहूँ, पर ये यादें हैं, कि  दिल से न जाती है II

३.  दुख गैरों से मिले, दुनिया जानती है,

सुख अपनों से मिले, यही सब मानते हैं I

सितमगर हैं बड़े, जो अपने, नासूर बन जाते,

ज़िगर के पास रहकर, ज़िगर  को बेंधते हैं II

सरस्वती वंदना

करता हूँ माँ शारदा,

नमन दोनों कर जोड़,

कृपया करें स्वीकार माँ,

इतनी विनती मोर I

देना माता ज्ञान मुझे,

कर सकूँ तेरा गुणगान,

रखना लाज बचा कर सब की,

रखना सब का मान I

बहुत बचायी  हो माता,

तू  बड़े-बड़ों की लाज,

किस्ती मेरी मझधार बीच है,

इसे बचा लो आज I

विमल ज्ञान देना माता,

मैं विमल करूँ सब काम,

करती तो तू  है सब कुछ, पर,

मेरा होता नाम I

बता भला क्या कहूँ तुझे,

तू माता मैं संतान,

बिन मांगे सब दे देती हो,

नहीं तू है अनजान I

देना ज्ञान सबों को माता,

जन-मन में तू, भर आलोक,

अज्ञानों  का तिमिर मिटा दो,

चमका दो, सारा लोक I

तू ब्रह्माणी, पत्नी ब्रह्म की,

ज्ञान का तू भंडार,

आसन  तेरा कमल पुष्प का,

विद्या का आगार I

हंसवाहिनी, श्वेत वस्त्र,

करद्वय में लेकर वीणा,

झंकार करो उन ज्ञान सुरों का,

मानव जिनसे, सीखे जीना I

सुन लो मेरी विनती इतनी,

ओ माता, वीणापाणी,

ज्ञान भरो, हर मानव जिससे,

बोले तेरी ही वाणी I

चमचों  का राज है

चमचागिरी कीजिये, चमचों  का राज है I

गुंडे-मवाली के, सर  पे धरा  ताज है II

आते हैं गुंडे लफंगों के संग,

सीधे-सपाटों  को करते हैं तंग I

हुड़दंग मचाते हैं, गाली सुनाते हैं,

लोग देख-देख रह जाते हैं दंग I

साथ नहीं देते हैं,  देख, बढ़ते जाते हैं I

न करते विरोध, उल्टे  फब्तियां चलाते  हैं II

चमचागिरी कीजिये, चमचों  का राज है I

गुंडे-मवाली के, सर  पे धरा  ताज है II

लुच्चों का नाम लेते ,

कहते दबंग हैं I

तलवे सहलाते रहते ,

रात-दिन संग हैं I

भाई-भैया कहते हैं, करते हैं सेवा I

चाटुकारी करते जो, पाते हैं मेवा II

चमचागिरी कीजिये, चमचों  का राज है I

गुंडे-मवाली के, सर  पे धरा  ताज है II

अपना सम्मान इन्हें ,

लगता न प्यारा I

कैसे हैं लोग, देखो,

लगते हैं न्यारा I

कहते हैं शान से, अपने ही राज है I

भाई ने लात मारा, इसमें क्या लाज है II

चमचागिरी कीजिये, चमचों  का राज है I

गुंडे-मवाली के, सर  पे धरा  ताज है II

न पढ़ा है, न लिखा है,

भाई गँवार  है I

पढ़े-लिखों पर फिर भी ,

भाई का राज है I

इसीलिए कहता हूँ, मूर्खों से ताज है I

इस प्रजातंत्र में,अनपढ़ का राज है II

चमचागिरी कीजिये, चमचों  का राज है I

गुंडे-मवाली के, सर  पे धरा  ताज है II

लूट-पाट  लाते हैं ,

दौलत बनाते हैं I

वोट वे, खरीद कर ,

नेता बन जाते हैं I

जो न देते वोट, उनका जीना मुहाल है I

कर देते तंग, उनका जीना  हराम है  II

चमचागिरी कीजिये, चमचों  का राज है I

गुंडे-मवाली के, सर  पे धरा  ताज है II

खाड़ी का कुर्ता-पाजामा सफ़ेद है ,

जूता-मोजा, बंडी, सारा सफ़ेद है I

कपड़े सफ़ेद सारे, पर दिल है काला ,

रात- दिन हैं, करते रहते घोटाला I

काले दिल वालों की, लम्बी जमात है I

दिन के उजाले में, बड़ी-बड़ी बात है II

चमचागिरी कीजिये, चमचों  का राज है I

गुंडे-मवाली के, सर  पे धरा  ताज है II

काकों का राज यहाँ ,

हंसन बेचारा I

गायों का खा जाते ,

छीन कर चारा I

संसद, विधायकी में, काकों का  राज है I

हंस बैठा बेचारा, कोने में आज है II

चमचागिरी कीजिये, चमचों  का राज है I

गुंडे-मवाली के, सर  पे धरा  ताज है II

जनता और नेता ,

बिकाऊ बने सारे I

जो न बिकते-खरीदते ,

वे जाते हैं मारे I

चुनाव हार जाते, होती लानत-मलामत I

उनके परिजनों पर भी,  आती है आफत II

चमचागिरी कीजिये, चमचों का राज है I

गुंडे-मवाली के, सर  पे धरा ताज है II

मुक्तक-2

1. किसको फुरसत है, मेरा  जख़्मेजिगर देखें लोग,

नज़र पड़ती है, मुख मोड़,  चल देते  है  लोग I

क्या जरूरत उन्हें, कि समय अपना बर्बाद करें,

अपने ही दर्द से परेशाँ , सदा होते है लोग II

2.क़यामत जितनी भी  ढा लो, नहीं मैं  त्याग हूँ सकता,

सितमगर बन सितम ढा  लो, नहीं मैं  भाग हूँ सकता I

खुदा, गर शक है तुमको, आजमा कर देख लो ,

कसम तेरी, नहीं अपनी जुबां से भाग हूँ सकता II

3. खंजर चला, या मार कोड़े सकते हो,

या गोली सीने में उतार सकते हो I

सर कलम, चाहो तो कर दो मेरा,

नहीं अपमान तिरंगे का कर सकते हो II

4. बागडोर देश का उनके हाथ आ गया,

जैसे भी हो, बहुमत उनके साथ आ गया I

भाषण में उनके जोश था, तुम भाव में बहे,

अब पछताये क्यों, जब चिड़ा चुग निकल गया II

5. प्रजातंत्र का क्यों, माखौल करते हो,

अपने मत का, क्यों नहीं सम्मान  करते हो I

कितनी बेशर्मी से, मत अपने बेच देते हो,

गुस्ताखी खुद करो, पर उसे बदनाम करते हो II

6. बेहयायी का मानो, जमाना आ गया,

शर्मोहया अब लुप्त, सारा हो गया I

दीद का पानी, आँखों से अब यूँ उतर गया,

करने को नग्न नृत्य, वो बेकरार हो गया II

7. मैं सुनाता हूँ तुम्हे, नहीं तुम ध्यान हो देते

बताता हूँ सही बातें, नहीं एतबार हो करते I

भॅवर में जा रहे हो डूबने, खुद -ब- खुद ही तू ,

लगोगे डूबने, तब याद होगी, ठीक थे कहते II

8. ऐ आसमाँ, तू हीं बता, क्यों हमें डराते हो,

बादलों की ओट से, क्यों बिजलियाँ  गिराते हो I

रोक मेरा रास्ता, गर रोक सकते हो,

क्यों दूर ऊपर, आसमाँ  से, गड़गड़ाते  हो II

9. न प्रीत कीजिये, बहुत रूलाती  है,

जिगर में घुस, चुपचाप बैठ जाती है  I

एहसास भी न होता , कब आयी,  बैठी,

निकाले नहीं निकलती,  बस सताती है  II